शहर और गाँव

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कल्पना कीजिए कि आप संयुक्त परिवार से हैं। आपके घर में यदि कोई एक ही धन कमाने वाला हो और बाकी अन्य उपभोक्ता हों तो सीधी सी बात है कि उस कमाने वाले व्यक्ति की सुख-सुविधा प्राथमिक होगी। बाकी सभी अन्य सदस्यों को उस पर निर्भर रहना होगा। वह जिस पर प्रसन्न होगा उसे ही सारी सुविधाओं का भागीदार बनायेगा और जिससे रुष्ट होगा, उसे वंचित कर देगा। वह भले ही ऊटपटांग काम करता है पर वह द्रव्य अर्जन करता है, अतः उसके सारे मूर्खोचित कार्य भी उसकी विशेष कार्यशैली का हिस्सा मान कर परिवार द्वारा अनुमोदित किये जायेंगे। कुल मिलाकर वह जो करेगा, वह अच्छा ही होगा; वह जो कहेगा वह भला ही होगा।

घर के बाकी अन्य सदस्य चाहे जितनी बुद्धीमत्ता पूर्ण बातें करें, कार्य करें यदि वे द्रव्य अर्जन करने में अक्षम हैं तो उनकी सारी प्रतिभा व्यर्थ है।

चलिए यहाँ तक ठीक है। यदि किसी दूसरे परिवार से इस परिवार का युद्ध हो जाये तो सारा परिवार उस कमाऊ व्यक्ति को बचाने में लग जायेगा और विरोधी परिवार इस एक मात्र व्यक्ति को अपने लपेटे में लेने के लिए सारे यत्न करेगा। यदि यह एक कमाऊ व्यक्ति मार दिया गया तो सारा परिवार बिखर कर सड़कों पर आ जायेगा।

यह तो हुई अर्थ की महत्ता। पर कभी आपने सोचा है कि क्या यह एक व्यक्ति केंद्रित व्यवस्था ठीक है? यदि नहीं सोचा है तो अब भी बहुत देर नहीं हुई है। सोचिए।

मैं इसका विकल्प प्रस्तुत कर रहा हूँ। यदि परिवार का हर व्यक्ति उपभोक्ता और उत्पादक दोनों ही हो तो सभी एक सम्मानित और वैयक्तिक स्वतंत्रता पूर्ण जीवन जी सकते हैं। और उससे भी अधिक वे यदि एक दूसरे के पूरक हों तो एक साहचर्य और प्रेमपूर्ण जीवन जी सकते हैं। सारे संसाधनों और कर्तव्यों को एक ओर कर दीजिए और सारे उपल्बध व्यक्तियों को एक ओर कर दीजिए। अब जो व्यक्ति जिस संसाधन के प्रसंस्करण के लिए उपयुक्त हो उसे उस में लगा दीजिए। एक या दो व्यक्ति बचा कर रखिए जिनकी बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका है। एक व्यक्ति जिसके पास सर्वाधिक अनुभव हो और धैर्य हो वह संसाधनों और व्यक्तियों की क्षमताओं का प्रबंधन करे और दूसरा व्यक्ति नये संसाधनों की खोज करे, उनके प्रसंस्करण व उत्पादन के साधनों के उपायों पर शोध करे। पूरा परिवार एक स्वतंत्र इकाई की भाँति कार्य करे और अपने को सम्पन्न व अधिक सक्षम बनाने के लिए वह इकाई अन्यान्य इकाइयों से सहभागिता करे और इस प्रक्रिया को अन्य स्तरों पर ले जाये। इससे एक सशक्त समाज बनेगा। और समाज से एक सशक्त राज्य बनेगा और उससे एक सशक्त राष्ट्र और राष्ट्रों से एक विश्व।

इस पूरी प्रक्रिया को आप छोटे से बड़े स्तर तक प्रयोग करते जाइए। जब तक कि कोई व्यावहारिक बाधा न आ जाये। यह व्यवस्था स्वयं में सक्षम है और किसी भी आक्रमण के विरुद्ध अपने आपको सशक्त रूप से चला सकती है। इस व्यवस्था में एक इकाई के नष्ट हो जाने से सब कुछ नष्ट न हो जायेगा अपितु यथाशीघ्र दूसरी पंक्ति इस अभाव की पूर्ति कर देगी।

अच्छा लगा न?
इसका नाम प्राचीन भारतीय वर्ण व्यवस्था है जिसने भारत को हजारों सालों से अनेकानेक आक्रमणों से बचाते हुए विश्वगुरू और स्वर्ण चटका की उपाधि दी थी। इसे ही महात्मा गांधी ग्राम स्वराज व्यवस्था में प्रोत्साहित करते हैं। इसे ही महर्षि अरविंद अपने दिव्य मानव की भूमिका का पोषक आधार मानते हैं। इसके लिए किसी दो कौड़ी के संविधान की आवश्यकता नहीं है और न ही किसी अफसरशाही या तानाशाही की। यह लाखों-हजारों साल की संचित चेतना स्मृति से से संचालित होती है जिसमें मानव मात्र के क्रमिक उद्विकास के सूत्र निहित हैं। यह किसी शहर पर केंद्रित व्यवस्था नहीं कि शहर ढहा तो देश ढहा। यह ग्रामीण व्यवस्था है जहाँ हर ग्राम अपने आप में एक इकाई है जहाँ प्राथमिक और द्वितीयक आवश्यकताएँ यथा–अन्न, पशुधन आदि संसाधनों के प्रसंस्करण व वितरण प्रबंधन के साथ शिक्षा, कुटीर उद्योग जैसे उपक्रम स्थापित किये जाते हैं। शहर केवल तृतीयक संसाधनों यथा–विलासिता की वस्तुएँ, उच्चस्तरीय प्रबंधन, अंतरिक्ष, सूचना तंत्र, संगणक अनुप्रयोग आदि के लिए हैं। किसी भी सङ्कट के समय प्राथमिक व द्वितीयक स्तर की व्यवस्था पूरे देश को सँभाल सकती है और तृतीयक स्तर की व्यवस्था को पुनश्च खड़ा कर देती है। यह वयवस्था यूरोप के अधिकांश सक्षम देशों, जापान, चीन जैसे देशों में अभी भी चल रही है। भारत ने इसी व्यवस्था के बूते ईरानी, यूनानी, रोमन, हूण, शक, चीनी, इस्लामी और ईसाई आक्रमणों से स्वयं को बचाते हुए भी अपने आपको बारम्बार खड़ा कर लिया। पर अंग्रेजों ने और उनके बाद काले अंग्रेजों ने इसे पूरी तरह से नकार कर एक व्यक्ति/शहर केंद्रित व्यवस्था का पोषण किया जिससे आज हमें ये दुर्दिन देखने को पड़ रहा है।

अभी किरौना ने हमें चिन्तन और क्रियान्वयन का एक अवसर दिया है। हमें इसका लाभ उठाना चाहिए।
डॉ. धीरज शुक्ल।


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